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आत्म निर्भर मजदूर और दान पर निर्भर सरकारें

 

 

[mkd_highlight background_color=”” color=”red”]विनीत दुबे[/mkd_highlight]

 

 

भारत केे इतिहास में कोरोना काल ने अपनी अमिट कहानी लिख दी है और नित नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। कोरोना संकट के भारत मेें 50 दिन से अधिक समय हो गया है। इस पूरे काल खंड में दो बातें समाने आई हैं। पहली बात तो यह है कि देश का मेहनतकश तबका आत्मनिर्भर है वह गगन चुंबी इमारत अपने श्रम के बल पर ही बनाता है तो वही कारखानों में लोहे तो गलाकर उसे मनचाहा आकार देने में सक्षम है। दूसरी बात यह है कि प्रदेश और केन्द्र की सरकार भी भगवान और दानदाताओं पर निर्भर है। इसलिए हम कह सकते हैं कि मजदूर आत्म निर्भर हैं और दानदाताओं पर निर्भर सरकार।

पिछले दो सप्ताह से लगातार देश भर में मजदूरों का अपने घर वापसी का दौर चल रहा है। गुजरात, महारष्ट्र दिल्ली सहित अन्य बड़े राज्यों से लाखों की तादाद में मजदूरों ने अपने गृह राज्यों की ओर कूच कर दिया। लाखों मजदूरों ने रेल की पटरियों के किनारे तो कईयों ने सड़क मार्ग से पैदल ही हजारों मील का रास्ता तय करने के लिए कदम बढ़ा दिए। मजदूरों के पलायन को लेकर पिछले दो सप्ताह से सरकार और उसके नुमाइंदे जिनमें नेता और अधिकारी शामिल हैं सभी के सभी अपनी जुबानें और कागजों पर कलम चला रहे हैं तो दूसरी तरफ मजदूर अपने नंगे कदम चला रहे हैं मंजिल पर पहुंचने के लिए। रोते बिलखते भूखे प्यासे अनगिनत मजदूर अपने गांवों सरहदों तक पहुंचने में कामयाब भी हुए हैं। लेकिन वे सरकारी कागज किसी लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाए हैं।

आपने घर की ओर शुरू हुई इस दौड़ में कई कदम लड़खड़ा भी गए तो कुछ जिन्दगी की दौड़ ही हार गए और उनके परिवार वालों की आंखे राह ताकती ही रह गईं। कुछ भूख से बेचैन हो कर पटरी पर ही सो गए तो वहीं उनकी आखिरी नींद पूरी हो गई। उन्हे तनिक भी अहसास नहीं हुआ कि यह वो आखिरी रात है जो कभी उन्हे भूख नहीं लगने देगी। इन घटनाओं ने देश के आमजनों की आंखें नम कर दी हैं तो आए दिन हो रही दुर्घटनाएं भी दिल दहला देने वाली हैं। प्रदेश के सीहोर, विदिशा, रायसेन, सागर, गुना, शिवपुरी और पचोर सहित अनगिनत स्थानों पर मजदूरों से भरे वाहन दुर्घटनाओं के शिकार हुए जिनमें सैकड़ों मजदूर कालकवलित हुए हैं।

दूसरी तरफ देश और प्रदेश की सरकार है जो पूरी तरह से दान दाताओं पर निर्भर है। गुजरात और महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश की जा रहे मजदूर जब मध्यप्रदेश की सीमा मंे प्रवेश कर रहे हैं तो उन्हें रास्ते में हर 5 – 10 किमी के दरम्यान कोई न कोई दानदाता भोजन कराने के लिए हाथ जोड़े सड़क किनारे खड़ा हुआ दिखाई दे ही देता है। कोई भोजन करा रहा है तो कोई वस्त्र, जूते चप्पल, दवाएं, चाय, खिचड़ी और बिस्किट आदि प्रदान कर रहा है। मध्यप्रदेश के अधिकांश शहरों के जागरूक युवाओं के संगठनों ने पैदल जाने वाले मजदूरों को वाहन आदि की भी व्यवस्थाएं कराई हैं। और हां यह कहना भी जरूरी है कि इन सब के बीच सरकार लगातार दानदाताओं से अपील कर रही है कि वे सरकार के खजाने में दान करें और मजदूरों की भी सेवा करें यानि हम कुछ नहीं करेंगे।

अब एक बात और चैंकाने वाली है कि बीते दिनों आज तक न्यूज चैनल में देश के अति जिम्मेदार मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि मजदूर यदि पैदल जा रहे हैं तो यह प्रदेशों के सरकारों की नाकामी है हमने पहले ही राज्य की सरकारों को मजदूरों की व्यवस्था के लिए 11 सौ करोड़ रूपए दिए हैं। अब सवाल यह उठता है कि देश के सभी राज्यों को 11 सौ करोड़ रूपए मिले तो उनका उपयोग मजदूरों के आवागमन के लिए क्यों नहीं किया गया।

विगत दो सप्ताह से महाराष्टृ और गुजरात से प्रतिदिन करीब 8 हजार चार पहिया वाहन और करीब 4 हजार तीन पहिया ऑटो हजारों मील का रास्ता तय करते हुए मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचा रहे हैं यह सभी मजदूर अपने खर्च पर इन वाहनों में सफर करने को विवश हुए हैं। इतनी बड़ी तादाद में मजदूरों की घर वापसी पर सरकार का आंखे मूंदना और दानदाताओं के भरोसे व्यवस्थाओं की उम्मीद करना सरकारों की काबिलियत का नमूना बयान करती हैं। यहां मशहूर शायर डाॅ. राही मासूम रजा की चंद पंक्तियां बहुत ही सटीक बैठती हैं कि..

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई,
हम न सोए रात थक कर सो गई!
दामन -ए -मौज -ए- सबा ख़ाली हुआ,
बू- ए -गुल दश्त- ए- वफ़ा में खो गई!
हाए इस परछाइयों के शहर में,
दिल सी इक ज़िंदा हक़ीक़त खो गई!
हम ने जब हँस कर कहा,
मम्नून हैं ज़िंदगी जैसे पशेमाँ हो गई!

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