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किसानों की धमक बढा सकती सियासी दलों की धडकनें

जोरावर सिंह

मध्यप्रदेश। देश में बीते चार महीने से किसान अपनी मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान संगठनों और सरकार के बीच ​फिलहाल बातचीत का रास्ता बंद है, और किसान आन्दोलन की राह पर बने हुए है। देश भर में किसान आन्दोलन को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हो रही है। दूसरी तरफ किसान अब सरकार के साथ भाजपा की मुखालफत भी खुलकर कर रहे है।
इस समय जहां सियासी दलों द्वारा किसान पंचायतों का आयोजन किया जा रहा है , जिनमें किसानों के हक की बातें हो रही है। किसानों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है, और भाजपा नेताओं का िवरोध भी हो रहा है। देश के हरियाणा में तो भाजपा के मंत्रियों को भी किसानों के विरोध का सामना करना पड रहा है, पंजाब में एक विधायक के साथ बदसलूकी का मामला सामने आया है, इसमें कौन दोषी है, कौन बेगुनाह यह तो जांच का विषय है, पर सियासत के केन्द्र में इस समय किसान ही है।

— क्या गुल खिलाएगी किसानों की अपील

किसान आन्दोलन में जब से किसानों के नेता देश के अन्य राज्यों में किसान महापंचायतों में शािमल होने वाले किसानों को संबोधित कर रहे है, इसके साथ ही बंगाल चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई है, बंगाल के इस चुनाव में संयुक्त किसान मोर्चा के कई नेता किसानों को संबोधित कर चुके है, इसमें किसानों के बड़े चेहरे के रूप में उभरे किसान नेता राकेश टिकैत भी शािमल है, वह अब खुले तौर पर किसानों से भाजपा को हराने की अपील करते देखे और सुने जा रहे है। ​किसान नेताओं की यह अपील कितनी असर कारी साबित होगी, यह तो बंगाल के चुनाव के परिणाम ही बताएंगे।

— तो बढेगी किसानों की धमक

देश में केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानून का विरोध बीते चार महीने से किसानों द्वारा लगातार किया जा रहा है। लेकिन किसान संगठन और केन्द्र सरकार के बीच बातचीत का क्रम टूटने के बाद से ही किसान संगठन देश के अन्य िहस्सों में किसान सभाओं का आयोजन कर रहे है, किसानों की सभाओं में काफी संख्या में किसान पहुंच रहे है। इसे किसान सियासत का आगाज भी माना जा रहा है। यदि किसान संगठनों के नेता जिस तरह से चुनावी राज्यों में भाजपा को हराने के लिए काफी जोर लगा रहे है, यदि वह अपने इरादों में कामयाब होते हैं, तो निश्चित तौर पर किसान सियासत की धमक बढेगी। यदि अस्ाफलता हाथ लगती है तो किसान सियासत को अगली रणनीित की ओर अग्रसर होना पड़ेगा।

— सियासी दलों का संकट

देश में किसान आन्दोलन से किसानों की ताकत बढ रही है, इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है। किसान अान्दोलन को चार महीने हो गए है, किसान आन्दोलन को जारी रखे हुए है। किसानों को आन्दोलन इस बात को मजबूती प्रदान कर रहा है कि किसानों का सांगठािनक ढांचा हवा में नहीं है, पूरी रणनीित के साथ काम हो रहा है। यही सियासी दलों का संकट है, यानी कि इसी तरह से सियासी दल भी संगठन के मजबूती के हिसाब से चुनावों में सफलता और असफलता हािसल करता है। यदि किसान कोई सियासी दल बनाकर खडे हो गए तो मुिश्कलें सियासी दलों की बढ जाएगी। यह चिंता पक्ष और विपक्ष्ा को सताने लगी है।

— किसानों का बडा वोट बैंक

देश में किसान आन्दोलन ने सियासी दलों की चिंता बढा दी है, इसकी वजह है कि किसानों का बडा वोट बैंक है, और इस वोट बैंक पर देश के छोटे बड़े सभी दलों की नजर रहती है, इस वोट बैंक की नाराजगी कोई भी सियासी दल नहीं लेना चाहते है, और देश में अभी तक किसान संगठन किसानों के हक की लडाई लडते रहे है, किसान आन्दोलन देश में जिस तरह से बढ रहा है, वह किसान और किसान संगठन के नेताओं के हौंसले में इजाफा कर रहे है। किसान आन्दोलन को लेकर अब यह चर्चाएं भी जोर पकडने लगी है कि कहीं अन्ना आन्दोलन की तरह यह आन्दोलन भी नए सियासी दल को जन्म न दे देे। यह तो वक्त बताएगा कि किसान जो कि चार महीने तक आन्दोलन चला चुके है, अब किस ओर जाएंगे।

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